नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे वेबसाइट पे, महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और चारों तरफ केवल चीख और पुकार के स्वर गूँज रहे थे | लोग अपने परिजनों को ढूंढ रहे थे, तो वहीँ कुछ लोग अपने परिवार वालों के मरने का शोक मना रहे थे | भीष्म पितामह भी बाणों की शैया पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण नक्षत्र में जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे ताकि मोक्ष की प्राप्ति हो सके |

इस दौरान भीष्म ने भगवान कृष्ण को आवाज़ लगाई और कहा कि "हे कान्हा मेरे पास आओ, मेरे मन में उठ रहे प्रश्नों का निवारण करो ताकि अंतिम समय में मैं संतुष्ट होकर अपने शरीर का त्याग कर सकूं | तुम तो परमब्रह्म हो न, तो मेरे कुछ प्रश्नों का उत्तर तो देते जाओ |" यह सुनकर भगवान कृष्ण ने बोला कि "मैं ईश्वर कहाँ हूँ पितामह, मैं तो आपका पौत्र हूँ जो आपका हाल जानने आया है | मैं आपके कौन से प्रश्न का उत्तर दे सकता हूँ महामहीम |"

भीष्म ने हंसते हुए कहा कि तुमने आज भी शब्दों से खेलना नहीं छोड़ा कान्हा | थोड़े विश्राम के बाद भीष्म ने श्रीकृष्ण से कहा कि हे प्रभु, मुझे बताओ कि महाभारत में पांडवों की विजय के पीछे वे सभी छल भी हैं जो तुमने कौरावों के साथ किये थे | तुम तो परब्रह्म हो, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का पुनर्जन्म हो | क्या तुम्हारे ऐसा करने से आने वाले समय में लोगों को गलत सन्देश नहीं मिलेगा |

इस पर भगवान कृष्ण ने कहा कि हे पितामह, प्रभु श्रीराम का जन्म त्रेतायुग में हुआ था | उस समय रावण को भी अपनी मर्यादाएं ज्ञात थीं, उसके कुल में भी मंदोदरी जैसी प्रतिव्रता स्त्री और विभीषण जैसे धर्मपरायण भाई हुआ करते थे | उस काल में मनुष्य की चेतना का इतना पतन नहीं हुआ था, जितना आज हो चुका है | यह द्वापरयुग है, यहाँ शत्रु इतना नीच है कि उसके संहार के लिए सभी मार्गों का सहारा लेना उचित है | हे पितामह, भविष्य में आने वाला समय तो इससे कठिन है, जहां धर्म की रक्षा के लिए और तामसी शक्तियों से निपटने के लिए मनुष्य को समस्त नैतिकताओं का त्याग करना होगा | यह सुनकर भीष्म संतुष्ट हो चुके थे, उनका मन शांत, आंखे धुंधली और सांसें धीमी पड़ने लगी थीं |

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