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सच होते सपने गोपुली ने कैसे बदली अपनी जिदंगी - Real Life Hindi Story



गोपुली को लगने लगा कि उस के मां बाप ने उस की जिंदगी तबाह कर दी है. उन्होंने न जाने क्या सोच कर इस कंगले परिवार में उसे ब्याहा था? वह तो बचपन से ही हसीन जिंदगी के ख्वाब देखती आई थी.

गोपुली को लगने लगा कि उस के मां बाप ने उस की जिंदगी तबाह कर दी है. उन्होंने न जाने क्या सोच कर इस कंगले परिवार में उसे ब्याहा था?

वह तो बचपन से ही हसीन जिंदगी के ख्वाब देखती आई थी.

‘‘ऐ बहू…’’ सास फिर से बड़बड़ाने लगी, ‘‘कमाने का कुछ हुनर सीख. इस खानदान में ऐसा ही चला आ रहा है.’’

‘‘वाह रे खानदान…’’ गोपुली फट पड़ी, ‘‘औरत कमाए और मर्द उस की कमाई पर गुलछर्रे उड़ाए. लानत है, ऐसे खानदान पर.’’

उस गांव में दक्षिण दिशा में कुछ कारीगर परिवार सालों से रह रहे थे. न जाने कितनी ही पीढि़यों से वे लोग ठाकुरों की चाकरी करते आ रहे थे. तरक्की के नाम पर उन्हें कुछ भी तो नहीं मिला था. आज भी वे दूसरों पर निर्भर थे.

पनराम का परिवार नाचमुजरे से अपना गुजरा करता आ रहा था. उस की दादी, मां, बीवी सभी तो नाचमुजरे से ही परिवार पालते रहे थे. शादीब्याह के मौकों पर उन्हें दूरदूर से बुलावा आया करता था. औरतें महफिलों में नाचमुजरे करतीं और मर्द नशे में डूबे रहते.

कभी गोपुली की सहेली ने कहा था, ‘गोपा, वहां तो जाते ही तुझे ठुमके लगाने होंगे. पैरों में घुंघरू बांधने होंगे.’

गोपुली ने मुंह बना कर जवाब दिया था, ‘‘नाचे मेरी जूती, मैं ऐसे खोटे काम कभी नहीं करूंगी.’’

लेकिन उस दिन गोपुली की उम्मीदों पर पानी फिर गया, जब उस के पति हयात ने कहा, ‘‘2 दिन बाद हमें अमधार की बरात में जाना है. वहां के ठाकुर खुद ही न्योता देने आए थे.’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली ने साफसाफ लहजे में मना कर दिया, ‘‘मैं नाचमुजरा नहीं करूंगी.’’

‘‘क्या…’’ हयात के हाथों से मानो तोते उड़ गए.

‘‘कान खोल कर सुन लो…’’ जैसे गोपुली शेरनी ही बन बैठी थी, ‘‘अपने मांबाप से कह दो कि गोपुली महफिल में नहीं नाचेगी.’’

‘‘फिर हमारे पेट कैसे भरेंगे बहू?’’ सामने ही हुक्का गुड़गुड़ा रहे ससुर पनराम ने उस की ओर देखते हुए सवाल दाग दिया.

‘‘यह तुम सोचो…’’ उस का वही मुंहफट जवाब था, ‘‘यह सोचना मर्दों का काम हुआ करता है.’’

गोपुली के रवैए से परिवार को गहरा धक्का लगा. आंगन के कोने में बैठा हुआ पनराम हुक्का गुड़गुड़ा रहा था. गोपुली की सास बीमार थी. आंगन की दीवार पर बैठा हुआ हयात भांग की पत्तियों को हथेली पर रगड़ रहा था.

‘‘फिर क्या कहती हो?’’ हयात ने वहीं से पूछा.

‘‘देखो…’’ गोपुली अपनी बात दोहराने लगी, ‘‘मैं मेहनतमजदूरी कर के तुम लोगों का पेट पाल लूंगी, पर पैरों में घुंघरू नहीं बांधूंगी.’’

कानों में घुंघरू शब्द पड़ते ही सास हरकत में आ गई. उसे लगा कि बहू का दिमाग ठिकाने लग गया है. वह खाट से उठ कर पुराना संदूक खोलने लगी. उस में नाचमुजरे का सामान रखा हुआ था.

सास ने संदूक से वे घुंघरू निकाल लिए, जिन के साथ उस के खानदान का इतिहास जुड़ा हुआ था. उन पर हाथ फेरते हुए वह आंगन में चली आई. उस ने पूछा, ‘‘हां बहू, तू पैरों में पायल बांधेगी या घुंघरू?’’

‘‘कुछ भी नहीं,’’ गोपुली चिल्ला कर बोली.

हयात सुल्फे की तैयारी कर चुका था. उस ने जोर का सुट्टा लगाया. चिलम का सारा तंबाकू एकसाथ ही भभक उठा. 2-3 कश खींच कर उस ने चिलम पनराम को थमा दी, ‘‘लो बापू, तुम भी अपनी परेशानी दूर करो.’’

पनराम ने भी जोर से सुट्टा लगाया. बापबेटे दोनों ही नशे में धुत्त हो गए. सास बोली, ‘‘ये दोनों तो ऐसे ही रहेंगे.’’

‘‘हां…’’ गोपुली ने भी कहा, ‘‘ये काम करने वाले आदमी नहीं हैं.’’

सामने से अमधार के ठाकुर कर्ण सिंह आते हुए दिखाई दिए. सास ने परेशान हो कर कहा, ‘‘ठाकुर साहब आ रहे हैं. उन से क्या कहें?’’

‘‘जैसे आ रहे हैं, वैसे ही वापस चले जाएंगे,’’ गोपुली ने जवाब दिया.

‘‘लेकिन… उन के बयाने का क्या होगा?’’

‘‘जिस को दिया है, वह लौटा देगा,’’ गोपुली बोली.

ठाकुर कर्ण सिंह आए, तो उन्होंने छूटते ही कहा, ‘‘देखो पनराम, तुम लोग समय पर पहुंच जाना बरात में.’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली ने बीच में ही कहा, ‘‘हम लोग नहीं आएंगे.’’

गोपुली की बात सुन कर ठाकुर साहब को अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था. उन्होंने पनराम से पूछा. ‘‘क्यों रे पनिया, मैं क्या सुन रहा हूं?’’

‘‘मालिक, न जाने कहां से यह मनहूस औरत हमारे परिवार में आ गई है,’’ पनराम ठाकुर के लिए दरी बिछाते हुए बोला.

ठाकुर दरी पर बैठ गए. वे गोपुली की नापजोख करने लगे. गोपुली को उन का इस तरह देखना अच्छा नहीं लगा. वह क्यारियों में जा कर गुड़ाईनिराई करने लगी और सोचने लगी कि अगर उस के पास भी कुछ खेत होते, तो कितना अच्छा होता.

अमधार के ठाकुर बैरंग ही लौट गए. गोपुली सारे गांव में मशहूर होने लगी. जितने मुंह उतनी ही बातें. सास ने पूछा, ‘‘क्यों री, नाचेगी नहीं, तो खाएगी क्या?’’

‘‘मेरे पास 2 हाथ हैं…’’ गोपुली अपने हाथों को देख कर बोली, ‘‘इन्हीं से कमाऊंगीखाऊंगी और तुम सब का पेट भी भरूंगी.’’

तीसरे दिन उस गांव में पटवारी आया. वह गोपुली के मायके का था, इसलिए वह गोपुली से भी मिलने चला आया. गोपुली ने उस से पूछा, ‘‘क्यों बिशन दा, हमें सरकार की ओर से जमीन नहीं मिल सकती क्या?’’

‘‘उस पर तो हाड़तोड़ मेहनत करनी होती है,’’ पटवारी के कुछ कहने से पहले ही हयात ने कहा.

‘‘तो हराम की कब तक खाते रहोगे?’’ गोपुली पति हयात की ओर आंखें तरेर कर बोली, ‘‘निखट्टू रहने की आदत जो पड़ चुकी है.’’

‘‘जमीन क्यों नहीं मिल सकती…’’ पटवारी ने कहा, ‘‘तुम लोग मुझे अर्जी लिख कर तो दो.’’

‘‘फिलहाल तो मुझे यहींकहीं मजदूरी दिलवा दो,’’ गोपुली ने कहा.

‘‘सड़क पर काम कर लेगी?’’ पटवारी ने पूछा.

‘‘हांहां, कर लूंगी,’’ गोपुली को एक नई राह दिखाई देने लगी.

‘‘ठीक है…’’ पटवारी बिशन उठ खड़ा हुआ, ‘‘कल सुबह तुम सड़क पर चली जाना. वहां गोपाल से बात कर लेना. वह तुम्हें रख लेगा. मैं उस से बात कर लूंगा.’’

सुबह बिस्तर से उठते ही गोपुली ने 2 बासी टिक्कड़ खाए और काम के लिए सड़क की ओर चल दी. वह उसी दिन से मजदूरी करने लगी. छुट्टी के बाद गोपाल ने उसे 40 रुपए थमा दिए.

गोपुली ने दुकान से आटा, नमक, चीनी, चायपत्ती खरीदी और अपने घर पहुंच गई. चूल्हा जला कर वह रात के लिए रोटियां बनाने लगी.

सास ने कहा, ‘‘ऐ बहू, तू तो बहुत ही समझदार निकली री.’’

‘‘क्या करें…’’ गोपुली बोली, ‘‘परिवार में किसी न किसी को तो समझदार होना ही पड़ता है.’’

गोपुली सासससुर के लिए रोटियां परोसने लगी. उन्हें खिलाने के बाद वह खुद भी पति के साथ रोटियां खाने लगी. हयात ने पानी का घूंट पी कर पूछा, ‘‘तुझे यह सब कैसे सूझा?’’

गोपुली ने उसे उलाहना दे दिया, ‘‘तुम लोग तो घर में चूडि़यां पहने हुए होते हो न. तुम ने तो कभी तिनका तक नहीं तोड़ा.’’ इस पर हयात ने गरदन झुका ली.

गोपुली को लगने लगा कि उस निठल्ले परिवार की बागडोर उसे ही संभालनी पड़ेगी. वह मन लगा कर सड़क पर मजदूरी करने लगी.

एक दिन उस ने गोपाल से पूछा, ‘‘मैं उन्हें भी काम दिलवाना चाहती हूं.’’

‘‘हांहां…’’ गोपाल ने कहा, ‘‘काम मिल जाएगा.’’

गोपुली जब घर पहुंची, तो हयात कोने में बैठा हुआ चिलम की तैयारी कर रहा था. गोपुली ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘ये गंदी आदतें छोड़ दो. कल से मेरे साथ तुम भी सड़क पर काम किया करो. मैं ने गोपाल से बात कर ली है.’’

‘‘मैं मजदूरी करूंगा?’’ हयात ने घबरा कर पूछा.

‘‘तो औरत की कमाई ही खाते रहोगे,’’ गोपुली ने ताना मारा.

‘‘नहीं, ऐसी बात तो नहीं है,’’ हयात सिर खुजलाते हुए बोला, ‘‘तुम कहती हो, तो तुम्हारे साथ मैं भी कर लूंगा.’’ दूसरे दिन से हयात भी सड़क पर मजदूरी करने लगा. अब उन्हें दोगुनी मजदूरी मिलने लगी. गोपुली को सासससुर का खाली रहना भी अखरने लगा.

एक दिन गोपुली ने ससुर से पूछा, ‘‘क्या आप रस्सियां बंट लेंगे?’’

‘‘आज तक तो नहीं बंटीं,’’ पनराम ने कहा, ‘‘पर, तुम कहती हो तो…’’

‘‘खाली बैठने से तो यही ठीक रहेगा…’’ गोपुली बोली, ‘‘दुकानों में उन की अच्छी कीमत मिल जाया करती है.’’ ‘‘बहू, मुझे भी कुछ करने को कह न,’’ सास ने कहा.

‘‘आप लंबी घास से झाड़ू बना लिया करें,’’ गोपुली बोली.

अब उस परिवार में सभी कमाऊ हो गए थे. एक दिन गोपुली सभापति के घर जा पहुंची और उन से कहने लगी, ‘‘ताऊजी, हमें भी जमीन दिलवाइए न.’’

तभी उधर ग्राम सेवक चले आए. सभापति ने कहा, ‘‘अरे हां, मैं तो तेरे ससुर से कब से कहता आ रहा हूं कि खेती के लिए जमीन ले ले, पर वह तो बिलकुल निखट्टू है.’’

‘‘आप हमारी मदद कीजिए न,’’ गोपुली ने ग्राम सेवक से कहा.

ग्राम सेवक ने एक फार्म निकाल कर गोपुली को दे दिया और बोले, ‘‘इस पर अपने दस्तखत कर दो.’’

‘‘नहीं,’’ गोपुली बोली, ‘‘इस पर मेरे ससुर के दस्तखत होंगे. अभी तो हमारे सिर पर उन्हीं की छाया है.’’

‘‘ठीक है…’’ सभापति ने कहा, ‘‘उन्हीं से करा लो.’’

गोपुली खुशीखुशी उस फार्म को ले कर घर पहुंची और अपने ससुर से बोली, ‘‘आप इस पर दस्तखत कर दें.’’

‘‘यह क्या है?’’ ससुर ने पूछा.

गोपुली ने उन्हें सबकुछ बतला दिया.

पनराम ने गहरी सांस खींच कर कहा, ‘‘अब तू ही हम लोगों की जिंदगी सुधारेगी.’’ उस दिन आंगन में सास लकड़ी के उसी संदूक को खोले बैठी थी, जिस में नाचमुजरे का सामान रखा हुआ था. गोपुली को देख उस ने पूछा, ‘‘हां तो बहू, इन घुंघरुओं को फेंक दूं?’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली ने मना करते हुए कहा, ‘‘ये पड़े रहेंगे, तो गुलामी के दिनों की याद दिलाते रहेंगे.’’

गोपुली ने उस परिवार की काया ही बदल दी. उस के साहस पर गांव वाले दांतों तले उंगली दबाने लगे. घर के आगे जो भांग की क्यारियां थीं, वहां उस ने प्याजलहसुन लगा दिया था.

सासससुर भी अपने काम में लगे रहते. पति के साथ गोपुली सड़क पर मजदूरी करती रहती. गोपुली की शादी को 3 साल हो चुके थे, लेकिन अभी तक उस के पैर भारी नहीं हुए थे. सास जबतब उस की जांचपरख करती रहती. एक दिन उस ने पूछा, ‘‘बहू, है कुछ?’’

‘‘नहीं…’’ गोपुली मुसकरा दी, ‘‘अभी तो हमारे खानेखेलने के दिन हैं. अभी क्या जल्दी है?’’ सास चुप हो गई. हयात और पनराम ने भांग छोड़ दी. अब वे दोनों बीडि़यां ही पी लेते थे.

एक दिन गोपुली ने पति से कहा, ‘‘अब बीड़ी पीना छोड़ दो. यह आदमी को सुखा कर रख देती है.’’

‘‘ठीक?है,’’ हयात ने कहा, ‘‘मैं कोशिश करूंगा.’’

आदमी अगर कोशिश करे, तो क्या नहीं कर सकता. गोपुली की कोशिशें रंग लाने लगीं. अब उसे उस दिन का इंतजार था, जब उसे खेती के लिए जमीन मिलेगी.

उस दिन सभापति ने हयात को अपने पास बुलवा लिया. उन्होंने उसे एक कागज थमा कर कहा, ‘‘ले रे, सरकार ने तुम को खेती के लिए जमीन दी है.’’

‘‘किधर दी है ताऊजी?’’ हयात ने पूछा.

‘‘मोहन के आगे सुंगरखाल में,’’ सभापति ने बताया. हयात ने घर जा कर जमीन का कागज गोपुली को दे दिया, ‘‘गोपुली, सरकार ने हमें खेती के लिए जमीन दे दी है.’’

गोपुली ने वह कागज ससुर को थमा दिया, ‘‘मालिक तो आप ही हैं न.’’ पनराम ने उस सरकारी कागज को सिरमाथे लगाया और कहा, ‘‘तुम जैसी बहू सभी को मिले.’

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